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बिहार में गीत संगीत

भारत में संगीत की परंपरा दो तरह की विकसित हुई है- 

1. प्रथम को शास्त्रीय संगीत

2. दूसरे को लोक संगीत कहा जाता है 

  • बिहार में उक्त दोनों प्रकार के संगीत प्रचलित है। शास्त्रीय संगीत में ताल, लय, मात्रा, राग रागिनी आदि से संबंधित जटिल नियमों का पालन करना होता है। 
  • शास्त्रीय संगीत दो प्रकार का होता है- कांट संगीत और वाद्य संगीत
  • लोकगीतों को सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप से बिना वाद्य यंत्रों की सहायता के भी गाया जा सकता है। 
  • बिहार में शास्त्रीय संगीत की एक सुदृढ़ परंपरा रही है। 
  • द्रुपद, धमार, खयाल, और ठुमरी राज्य की सर्वाधिक प्रचलित शास्त्रीय संगीत है।
  • लोकगीतों को सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप से विना वाद्य यंत्रों की सहायता के भी गाया जा सकता है।
  • राज्य में लोकगीतों की व्यापक परंपरा, स्थानीय लोकगीतों में चैती, कजरी, होली आदि प्रचलित है। इन गीतों को लोग छोटे-छोटे समूहों में झूम झूम कर गाते हैं। चेती मूल रूप से भोजपुरी क्षेत्र की गायन शैली है। होली के अवसर पर विशेष प्रकार की लय में गीत गाए जाते हैं, जिन्हें फाग कहा जाता है।
  • बिहारी लोकगीतों में बारहमासा का एक अलग स्थान है। बारहमासा में वर्ष के प्रत्येक महीने की विशेषता का वर्णन है। जब आकाश में काले काले बादल घिरे रहते हैं, पूइया बयार बहने लगती है, और हल्की हल्की फुहार भी पड़ने लगती है तब किशोरिया व नव वधु झूले पर झूलती हुई बारहमासा और कजरी गाती है।
  • मिथिला में विशेष तौर पर विद्यापति के गीत गाने की परंपरा है। इन गीतों को नचारी भी कहते हैं और इनका स्वरूप अर्द्धशास्त्रीय होता है। नचारी में भगवान शिव की स्तुति की जाती है।
  • लोकगीतों का घनिष्ठ संबंध जनजीवन से होता है। विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग लोक गीत गाए जाते हैं, जैसे – शिशुओं के जन्म के अवसर पर महिलाएं सोहर गाती हैं। किसी नवजात शिशु के जन्म पर पवारिया खैलोना और बधावा गाते हुए नाचते हैं। विवाह उत्सव में झूमर गाया जाता है। जबकि बेटी विदाई के अवसर पर समदाउन गाया जाता है।
  • पुरुषों के बीच आल्हा, बिरहा और लोरीकायन गाने और सुनने की पुरानी परंपरा रही है। चरवाहे बिरहा गाते हुए अपने अपने मवेशियों को चराते हैं, जबकि गांव में, हाट-बाजारों में, रेलवे स्टेशनों पर आल्हा और लोरीकायन सुनने और सुनाने की परंपरा है। आल्हा वीर रस प्रधान लोक काव्य है।

बिहार के प्रमुख लोक गीत

ऋतु गीत

  • बिहार में प्रत्येक ऋतु में अलग-अलग गीत गाए जाते हैं जिन्हें ऋतु गीत कहा जाता। विभिन्न ऋतु गीतों के नाम है- कजरी, चैता, बारहमासा, हीडोल आदि।

संस्कार गीत

  • बिहार में विवाह, जनेऊ, मुंडन तथा बालक बालिकाओं के जन्मोत्सव आदि के अवसर पर विभिन्न संस्कार गीत गाए जाते हैं। यह संस्कार गीत है - सोहर, समदाउन, गोना, बेटी विदाई, बंधावा आदि।

पेशा गीत

  • बिहार में विभिन्न पेशो के लोग अपना कार्य करते समय मस्ती में जो गीत गाते हैं उसे ही पेशा गीत कहा जाता है। बिहार में विभिन्न पेशा गीत है -
  • गेहूं पिसते समय जाता-पिसाईं या जातसारी।
  • छत की ढलाई करते समय थपाई।
  • छप्पर छाते समय छवाई।
  • इनके अतिरिक्त रोपनी, सोनी आदि कार्य को करते समय भी गीत गाए जाते हैं।

गाथा गीत

  • बिहार राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के गाथा गीत गाए जाते हैं जिनमें प्रमुख है - लोरिकायन, सलहेस, बीजमेल, दिना भदरी आदि।

लोरीकायन

  • लोरीकायन वीर रस का लोकगीत है। इस गीत के माध्यम से लोरी के जीवन प्रसंगों का वर्णन किया जाता है। इस लोकगीत को मुख्य रूप से अहिर लोग आते हैं, क्योंकि इससे गाथा का नायक अहिर था। इस गाथा को मिथिला, भोजपुरी व मगही क्षेत्रों के लोग अपने-अपने ढंग से कहते हैं।

सलहेस

  • सलहेस ,दोना, नामक एक मालिन का प्रेमी था। किसी शत्रु ने ईर्ष्या व्यस्तता के कारण सलहेश पर चोरी का झूठा आरोप लगाकर उसे बंदी बनवा दिया। दोना मालिन ने जिस ढंग से अपने प्रेमी सलहेश को मुक्त कराया, उसी प्रकरण को इसे लोकगीत के माध्यम से सुनाया और प्रस्तुत किया जाता है।

विजमैल

  • विजमैल में लोकगीत के अंतर्गत से गीतों के माध्यम से राजा विजयमल की वीरता का वर्णन किया जाता है।

दीना-भदरी

  • दीना-भदरी लोकगीत के माध्यम से दीना और भदरी नामक दो भाइयों की वीरता की मार्मिककथा के साथ गाया जाता है। इनके अतिरिक्त राज्य में अन्य अनेक गाथा गीत भी गाए जाते हैं, जैसे- आल्हा, मैनावती, गोपीचंद, बिहुला, राजा हरिश्चंद्र, कुंवर बृजभान, लाल महाराज, कालिदास, छतीर चौहान, राजा ढोलन सिंह आदि की जीवन गाथा पर आधारित गाथा गीत है।

पर्वगीत

  • बिहार में भिन्न-भिन्न पर्व त्योहारों के अवसर पर भिन्न-भिन्न प्रकार के मांगलिक गीत गाए जाते हैं, जिसे पर्वगीत कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर तीज, छठ, गोधन, रामनवमी, जन्माष्टमी, होली, दीपावली के अवसर पर अनेक प्रकार के गीत गाए जाते हैं। इनके अधिक बिहार में सांझ प्राती, झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण गीत भी गाए जाते हैं।

बिहार में प्रचलित राग

  • प्राचीन काल से ही बिहार में विभिन्न रागों का प्रचलन रहा है, जो विभिन्न संस्कारों के समय गाए जाते हैं। बिहार में संगीत के क्षेत्र में नचारी, चैता, पूर्वी तथा फाग रागों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

नचारी

  • मिथिला के प्रख्यात कवि विद्यापति नचारी राग के गीतों का सृजन किया है। नचारी में भगवान शिव की स्तुति की जाती है।

लगनी

  • लगनी राग के गीतों की रचना भी महाकवि विद्यापति ने ही की थी। लगनी राग उत्तर बिहार के दरभंगा, मधु, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया आदि जिलों में विवाह के अवसर पर गाए जाते हैं।

फाग

  • फाग राग के गीतों की रचना कथित तौर पर नवल किशोर सिंह ने की जो फगुआ या होली गीत के रूप में प्रसिद्ध है। नवल किशोर सिंह बेतिया राज्य के जमींदार थे।

पूरबी

  • पूरबी राग के गीतों का जन्म सारण जिला में हुआ। इन गीतों के माध्यम से वीरहिनियाँ, अपनी दयनीय दशा का वर्णन करती है और गीतों के द्वारा पति वियोग का वर्णन करती है।

बिहार के प्रमुख लोक गायक/गायिका

  • बिहार के प्रमुख लोक गायको/गायिकाओं में प्रमुख नाम है - विंध्यवासिनी देवी, कुमुद अखौरी, शारदा सिन्हा, भरत सिंह भारती, मोतीलाल मंजुल, कमला देवी, ग्रेस कुजूर, ब्रज किशोर दुबे,अजीत कुमार अकेला, योगेंद्र सिंह अलबेला, उर्वशी, रेणुका, लतिका झा, माया रानी दास, गजेंद्र नारायण सिंगर गजेंद्र महाराज पंडित राम कैलाश यादव (भिखारी ठाकुर पुरस्कार से सम्मानित) आदि।



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