धर्म पालने करने के मार्ग में सबसे अधिक बाधा चित की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता से पड़ती है। मनुष्य के कर्त्तव्य मार्ग में एक ओर तो आत्मा के बुरे-भले कामों का ज्ञान दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता रहती है। बस मनुष्य इन्ही दोनों के बीच में पड़ा रहा है। अंत में यदि उसका मन पक्का हुआ, तो वह आत्मा की आज्ञा मानकर अपना धर्म पालन करता है, पर उसका मन दुविधा में पड़ रहा है, तो स्वार्थपरता उसे निश्चित ही घेरेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जायेगा। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात को करने की प्रवृत्ति दें, उसे बिना स्वार्थ सोचें, झटपट कर डालना चाहिए। इस संसार में जीतने बड़े-बड़े लोग हुए है सभी ने अपने कर्तव्य को सबसे श्रेष्ठ माना है, क्योंकि जितने कर्म उन्होंने किए उन सबने अपने कर्तव्य पर ध्यान देकर न्याय का बर्ताव किया। जिन जातियों में यह गुण पाया जाता है। वे ही संसार में उन्नति करती है और संसार में उनका नाम आदर से लिया जाता है। जो लोग स्वार्थी होकर अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं देते, वे संसार में लज्जित होते हैं और सब लोग उनसे घृणा करते हैं। 'कायर' की भाववाचक संज्ञा है -

  • 1

    कायरपन

  • 2

    कायरतत्व

  • 3

    कायरता

  • 4

    अकायरता

Answer:- 3

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